FaithMantra SarovarVidur Niti Adhyay 3 | Vidur Niti 3 Adhyay | Vidur Niti Teesra Adhyay | Vidur Niti 3 | MANTRA SAROVAR
Vidur Niti Adhyay 3 | Vidur Niti 3 Adhyay | Vidur Niti Teesra Adhyay | Vidur Niti 3 | MANTRA SAROVAR
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Description
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Adhyay 3
धृतराष्ट्र ने कहा- महाबुद्धे ! तुम पुनः धर्म और अर्थ से युक्त बातें कहो। इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहीं मिलती। इस विषय में तुम अध्भुत भाषण कर रहे हो ।।
विदुर जी बोले- सब तीर्थों में स्नान और सब प्राणियों के साथ कोमलता का बर्ताव-ये दोनों एक समान हैं; अथवा कोमलता के बर्ताव का विशेष महत्त्व है ।।
विभो ! आप अपने पुत्र कौरव, पाण्डव दोनों के साथ समानरूप से कोमलता का बर्ताव कीजिये। ऐसा करने से इस लोक में महान् सुयश प्राप्त करके मरने के पश्चात् आप स्वर्गलोक में जायेंगे ।।
पुरुषश्रेष्ठ ! इस लोक में जबतक मनुष्य की पावन कीर्तिका गान किया जाता है, तब तक वह स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है ।।
इस विषय में उस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें 'केशिनी' के लिये सुधन्वा के साथ विरोचन के विवाद का वर्णन है ।।
राजन् ! एक समय की बात है, केशिनी नाम वाली एक अनुपम सुन्दरी कन्या सर्वश्रेष्ठ पति वरण करने की इच्छा से स्वयंवर सभा में उपस्थित हुई ।।
उसी समय दैत्यकुमार विरोचन उसे प्राप्त करने की इच्छा से वहाँ आया। तब केशिनी ने वहाँ दैत्यराज से इस प्रकार बातचीत की ।।
केशिनी बोली- विरोचन ! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं तो सुधन्वा ब्राह्मण ही मेरी शय्या पर क्यों न बैठे? अर्थात् में सुधन्वा से विवाह क्यों न करूँ? ।।
विरोचन ने कहा- केशिनी ! हम प्रजापति की श्रेष्ठ संतानें हैं, अतः सबसे उत्तम है। यह सारा संसार हम लोगों का ही है। हमारे सामने देवता क्या है? और ब्राह्मण कौन चीज हैं ?
केशिनी बोली- विरोचन ! इसी जगह हम दोनों प्रतीक्षा करें; कल प्रातःकाल सुधन्वा यहाँ आऐगा। फिर मैं तुम दोनों को एकत्र उपस्थित देखूँगी ।।
विरोचन बोला- कल्याणी ! तुम जैसा कहती हो, वहीं करूँगा। भीरु ! प्रातःकाल तुम मुझे और सुथन्वा को एक साथ उपस्थित देखोगी ।।
विदुर जी कहते हैं- राजाओं में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र ! इसके बाद जब रात बीती और सूर्यमण्डल का उदय हुआ, उस समय सुधन्वा उस स्थान पर आया, जहाँ विरोचन केशिनी के साथ उपस्थित था ।।
भरतश्रेष्ठ ! सुधन्वा प्रह्लादकुमार विरोचन और केशिनी के पास आया। ब्राह्मण को आया देख केशिनी उठ खड़ी हुई और उसने उसे आसन, पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया ।।
सुधन्वा बोला- प्रह्लादनन्दन। मैं तुम्हारे इस सुवर्णमय सुन्दर सिंहासन को केवल छू लेता हूँ, तुम्हारे साथ इसपर बैठ नहीं सकता; क्योंकि ऐसा होने से हम दोनों एक समान हो जायेंगे ।।
विरोचन ने कहा- सुधन्व ! तुम्हारे लिये तो पीढ़ा, चटाई या कुश-का आसन उचित है; तुम मेरे साथ बराबर के आसन पर बैठने योग्य हो ही नहीं ।।
सुधन्वा ने कहा- पिता और पुत्र एक साथ एक आसन पर बैठ सकते हैं; दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य और दो निम्नकुल भी एक साथ बैठ सकते हैं; किंतु दूसरे कोई दो व्यक्ति परस्पर एक साथ नहीं बैठ सकते ।।
तुम्हारे पिता प्रह्लाद नीचे बैठकर ही मेरी सेवा किया करते हैं। तुम अभी बालक हो, घर में सुख से पले हो; अतः तुम्हें इन बातों का कुछ भी ज्ञान नहीं है ।।
विरोचन बोला- सुधन्व ! हम असुरों के पास जो कुछ भी सोना, गौ, घोड़ा आदि धन है, उसकी में बाजी लगाता हूँ: हम-तुम दोनों चलकर जो इस विषय के जानकार हों, उनसे पूछें कि हम दोनों में कौन श्रेष्ठ है? ।।
सुधन्वा बोला- विरोचन ! सुवर्ण, गाय और घोड़ा तुम्हारे ही पास रहें। हम दोनों प्राणों की बाजी लगाकर जो जानकार हों, उनसे पूछें ।।
विरोचन ने कहा- अच्छा, प्राणों की बाजी लगाने के पश्चात् हम दोनों कहाँ चलेंगे? मैं तो न देवताओं के पास जा सकता हूँ और न कभी मनुष्यों से ही निर्णय करा सकता हूँ।।
सुधन्वा बोला- प्राणों की बाजी लग जाने पर हम दोनों तुम्हारे पिता के पास चलेंगे। मुझे विश्वास है कि प्रह्लाद अपने बेटे के लिये भी झूठ नहीं बोल सकते हैं।।
विदुर जी कहते हैं- इस तरह बाजी लगाकर परस्पर क्रुद्ध हो विरोचन और सुधन्वा दोनों उस समय वहाँ गये, जहाँ प्रह्लाद जी थे ।।
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स्वर - भास्कर पंडित
Voice By - Bhaskar Pandit
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Details
- Published
- Aug 31, 2026, 4:56 PM
- Length
- 18:25 (1,105 s)
- Format
- Long-form
- Category
- Music
- Audio language
- HI
- Quality
- HD
- Captions
- Yes
- Made for kids
- No
- Licensed content
- Yes
- Video ID
- uqiQviJO3pE
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