गरीब की उम्र गुजर जाती है | निर्गुण भजन | Nirgun Bhajan
Long-form5:32MusicPublished Oct 22, 2026, 6:56 AM · 2d ago
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Description
ग़रीब की उम्र गुज़र जाती है
यहाँ रोटी की ख़ातिर उम्र गुज़र जाती है,
किसी की रात कमाई में उतर जाती है।
वो जो कहता था कि सब साथ निभाएँगे,
वक़्त पड़ता है तो आवाज़ बदल जाती है।
मुखड़ा
बुरे हालात में अपने भी परख़े जाते हैं,
ख़ाली जेबों में कई रिश्ते बिछड़ जाते हैं।
हम जिन्हें देखकर दुनिया से लड़ा करते थे,
वही मुश्किल में नज़रें भी चुरा जाते हैं।
अंतरा 1 — ग़रीबी की सच्चाई
बाप बूढ़ा है मगर काम पे जाता ही है,
घर का चूल्हा है कि एहसान जताता ही है।
बेटा कहता है कि इस बार कमा लूँगा बहुत,
माँ का हर ख़त उसे ख़र्चा ही बताता ही है।
एक अरमान था बच्चों को पढ़ाने का उसे,
अपनी ख़्वाहिश को वो चुपचाप दबाता ही है।
अंतरा 2 — बदलते रिश्ते
जब तलक पास में पैसा था, सभी अपने थे,
चाय के दौर थे, हँसने के कई सपने थे।
आज तंगी है तो महफ़िल में बुलाता कौन है,
कल जो कहते थे कि हम आपके अपने थे।
नाम, दौलत हो तो दुनिया भी सलाम करती है,
ख़ाली हाथों को कहाँ कोई पहचानता है।
मुखड़ा दोहराएँ
बुरे हालात में अपने भी परख़े जाते हैं,
ख़ाली जेबों में कई रिश्ते बिछड़ जाते हैं।
अंतरा 3 — ज़िम्मेदारियों का बोझ
अपनी उम्रों को कमाते हुए काटा हमने,
दूसरों के लिए ख़ुद को ही बाँटा हमने।
एक दिन माँ ने कहा, बेटा, थके लगते हो,
हँस के कह दिया, बस नींद नहीं आई अम्मा।
वो समझती रही सब ठीक है दुनिया में मेरी,
मैंने तकलीफ़ भी मुस्कान में ढाँपी अपनी।
अंतिम शेर — धीमी, टूटती हुई आवाज़ में
जब कभी वक़्त मिले, हाल हमारा पूछना,
हम भी इंसान हैं, इतना तो हमारा हक़ है।
सबको मज़बूत नज़र आने की आदत है हमें,
कौन समझे कि हमें भी कभी रोने का हक़ है।
यहाँ रोटी की ख़ातिर उम्र गुज़र जाती है,
और इंसान की ख़्वाहिश कहीं मर जाती है।
Details
- Published
- Oct 22, 2026, 6:56 AM
- Length
- 5:32 (332 s)
- Format
- Long-form
- Category
- Music
- Audio language
- HI
- Quality
- HD
- Captions
- No
- Made for kids
- No
- Licensed content
- Yes
- Video ID
- kZoMqWA10Ao
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